नई दिल्ली। ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों पर विचार कर रही संसद की संयुक्त समिति (JPC) के सामने एक ओर अर्थशास्त्रियों ने एक साथ चुनाव कराने के विचार के समर्थन में आर्थिक और प्रशासनिक तर्क रखे, वहीं दूसरी ओर निर्वाचन आयोग को प्रस्तावित अतिरिक्त शक्तियों को लेकर स्पष्टता की जरूरत भी बताई गई। इसी बीच, समिति और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच प्रस्तावित अनौपचारिक बैठक को अदालत ने रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द की बैठक?
सूत्रों के अनुसार, JPC के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर को समिति के साथ 6 अक्टूबर को शाम 4:30 बजे बैठक की पुष्टि की थी। बैठक को ‘लोकल स्टडी विजिट’ के तहत प्रस्तावित किया गया था, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और अन्य न्यायाधीशों के साथ एक अनौपचारिक चर्चा भी शामिल थी। हालांकि, 1 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने बैठक रद्द कर दी। अदालत की ओर से कहा गया कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन भविष्य में न्यायिक समीक्षा का विषय बन सकता है, इसलिए इस मुद्दे पर प्रशासनिक स्तर पर चर्चा करना उचित या वांछनीय नहीं होगा। इस प्रस्तावित बैठक पर राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल समेत कुछ सदस्यों ने आपत्ति जताई थी। सिब्बल ने इसे असंवैधानिक बताया था, क्योंकि जिन विधेयकों पर समिति विचार कर रही है, वे भविष्य में अदालत के सामने आ सकते हैं।
इसी मुद्दे पर JPC के सामने मुख्य आर्थिक सलाहकार (Chief Economic Adviser, CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों से सरकारों की राजकोषीय प्राथमिकताएं राजस्व व्यय की ओर झुक सकती हैं और पूंजीगत व्यय प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि लगातार चुनावी गतिविधियों से नीतिगत निर्णयों पर असर पड़ सकता है। इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, नागेश्वरन ने एक साथ चुनाव की अवधारणा का समर्थन करते हुए कहा कि इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं को लगातार चुनाव प्रचार के बजाय शासन पर अधिक समय देने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, उन्होंने प्रस्तावित कानून के तहत निर्वाचन आयोग को मिलने वाली विस्तारित शक्तियों पर अधिक स्पष्टता की जरूरत जताई।
JPC के समक्ष आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष एस. महेंद्र देव और विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के अध्यक्ष एस. गुरुमूर्ति ने भी एक साथ चुनाव कराने के विचार का समर्थन किया। उन्होंने लगातार होने वाले चुनावों को संघीय ढांचे में व्यवधान से जोड़ा और तर्क दिया कि एक साथ चुनाव इस व्यवधान को कम कर सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, गुरुमूर्ति ने यह भी कहा कि बार-बार चुनावों से राजनीतिक दलों के स्थायी रूप से भुगतान पाने वाले कार्यकर्ताओं और चुनावों में धनबल के इस्तेमाल जैसी स्थितियां पैदा होती हैं।
निर्वाचन आयोग की शक्तियों पर सवाल
एक साथ चुनाव कराने के विचार के समर्थन के साथ-साथ प्रस्तावित कानून के तहत निर्वाचन आयोग की शक्तियों को लेकर चिंता भी सामने आई है। इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, नागेश्वरन ने इन शक्तियों को लेकर स्पष्टता की आवश्यकता बताई। वहीं इंडियन एक्सप्रेस ने बताया कि समिति के समक्ष पहले उपस्थित हुए चार पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने भी प्रस्तावित व्यवस्था के संवैधानिक पहलुओं पर चर्चा के दौरान निर्वाचन आयोग की व्यापक प्रस्तावित शक्तियों को लेकर चिंता जताई थी।
JPC संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच कर रही है। दोनों विधेयक दिसंबर 2024 में संसद में पेश किए गए थे और बाद में संयुक्त समिति को भेजे गए। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का रास्ता तैयार करना है।
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