नई दिल्ली: स्कूल में पढ़ाई के साथ सुरक्षित पेयजल, उपयोग योग्य शौचालय और हाथ धोने की सुविधा भी बच्चों के लिए बुनियादी जरूरतें हैं। लेकिन WHO और UNICEF के Joint Monitoring Programme (JMP) की नई रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के कई स्कूलों में ये सुविधाएं अब भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में करीब 5 करोड़ बच्चे ऐसे स्कूलों में थे जहां कोई सैनिटेशन सेवा उपलब्ध नहीं थी।
WHO/UNICEF की “Progress on Drinking-water, Sanitation and Hygiene in Schools – 2015–2025” रिपोर्ट स्कूलों में पानी, सैनिटेशन और हाइजीन यानी WASH सेवाओं की स्थिति का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलनीय आकलन करती है। इसमें 2025 तक के राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक आंकड़ों के आधार पर 2015 से हुई प्रगति का आकलन किया गया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि 2030 तक स्कूलों में सार्वभौमिक बेसिक WASH सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में दुनिया मौजूदा रफ्तार से आगे नहीं बढ़ रही है।
भारत में सैनिटेशन की बड़ी चुनौती
2025 में दुनिया के 460 मिलियन स्कूली बच्चों को स्कूल में बेसिक सैनिटेशन सेवा उपलब्ध नहीं थी। इनमें 244 मिलियन बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ते थे जहां कोई सैनिटेशन सेवा ही उपलब्ध नहीं थी। भारत में इस दूसरी श्रेणी—यानी स्कूल में किसी भी सैनिटेशन सेवा के अभाव—में करीब 5 करोड़ बच्चे थे।यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है। किसी स्कूल में शौचालय या सैनिटेशन ढांचा मौजूद होना अपने-आप में JMP के “बेसिक सैनिटेशन” मानक को पूरा नहीं करता।
JMP के अनुसार बेसिक सैनिटेशन सेवा के लिए स्कूल में improved sanitation facilities होनी चाहिए, जो single-sex हों और छात्रों के लिए usable हों। इसलिए केवल शौचालय का निर्माण हो जाना पर्याप्त नहीं है; उसकी उपलब्धता, उपयोगिता और व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। भारत में 2015 से 2025 के दौरान स्कूलों में सैनिटेशन सेवा की स्थिति में सुधार हुआ है। हालांकि, बड़ी संख्या में बच्चों के स्कूल अब भी किसी सैनिटेशन सेवा से वंचित हैं, जिससे सार्वभौमिक कवरेज तक पहुंचने की चुनौती बनी हुई है।
पेयजल में भारत की स्थिति
स्कूलों में पेयजल की तस्वीर सैनिटेशन की तुलना में अलग है। 2025 में वैश्विक स्तर पर 429 मिलियन स्कूली बच्चे ऐसे स्कूलों में थे जहां बेसिक drinking-water service उपलब्ध नहीं थी। बेसिक सेवा के लिए improved drinking-water source से पानी उपलब्ध होना जरूरी है।भारत उन देशों में शामिल है जहां स्कूलों में बेसिक drinking-water coverage में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ देशों में मौजूदा प्रगति की दर 2030 तक सार्वभौमिक बेसिक drinking-water coverage हासिल करने की दिशा में पर्याप्त मानी गई है।
हाइजीन की स्थिति
स्कूल WASH की तीसरी प्रमुख कड़ी हाइजीन है। JMP के अनुसार 2025 में दुनिया के 545 मिलियन स्कूली बच्चों को स्कूल में बेसिक hygiene service उपलब्ध नहीं थी। इनमें 362 मिलियन बच्चे ऐसे स्कूलों में थे जहां हाथ धोने की कोई सुविधा ही नहीं थी।बेसिक hygiene service का अर्थ ऐसी handwashing facility से है जहां पानी और साबुन दोनों उपलब्ध हों। इसलिए केवल हाथ धोने की जगह या नल का होना पर्याप्त नहीं माना जाता।
भारत के मामले में हालिया hygiene data की उपलब्धता सीमित है। JMP ने Central and Southern Asia के लिए उपलब्ध आंकड़ों की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए कुछ देशों के लिए नए अनुमान जारी नहीं किए हैं। इसलिए भारत के hygiene आंकड़ों को प्रस्तुत करते समय वर्ष और data availability को स्पष्ट करना जरूरी है।
2030 का लक्ष्य अभी चुनौतीपूर्ण
रिपोर्ट का वैश्विक निष्कर्ष स्पष्ट है: 2030 तक स्कूलों में 99 प्रतिशत से अधिक बेसिक WASH कवरेज हासिल करने के लिए मौजूदा प्रगति की रफ्तार पर्याप्त नहीं है। सार्वभौमिक कवरेज तक पहुंचने के लिए बेसिक drinking water में प्रगति की मौजूदा दर को चार गुना और sanitation में पांच गुना बढ़ाना होगा। WHO की रिपोर्ट hygiene के लिए भी चार गुना वृद्धि की आवश्यकता बताती है।
मौजूदा रुझान जारी रहने पर 2030 में दुनिया के करीब 84 प्रतिशत स्कूलों में बेसिक water service, 81 प्रतिशत में basic sanitation और 79 प्रतिशत में basic hygiene service होने का अनुमान है। इसका अर्थ है कि SDG अवधि के अंत तक लगभग 10 प्रतिशत स्कूलों में water service, 7 प्रतिशत में sanitation service और 12 प्रतिशत में hygiene service नहीं होगी।
स्कूलों में WASH की स्थिति केवल बुनियादी ढांचे का सवाल नहीं है। सुरक्षित पानी, उपयोग योग्य सैनिटेशन और साबुन-पानी वाली handwashing facility बच्चों के स्कूल वातावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। WHO/UNICEF JMP की रिपोर्ट यह दिखाती कि वैश्विक स्तर पर सुविधाओं की उपलब्धता में प्रगति हुई है, लेकिन 2030 के सार्वभौमिक कवरेज लक्ष्य तक पहुंचने के लिए प्रगति की रफ्तार बढ़ानी होगी।
भारत के लिए भी चुनौती केवल नए शौचालय या पानी की सुविधाएं बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि स्कूलों में उपलब्ध सुविधाएं usable, उपलब्ध और JMP के बेसिक WASH मानकों के अनुरूप हों।
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