सिद्धार्थनगर। गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की राजनीति में ध्रुव कुमार त्रिपाठी का सफर इस बार नए मोड़ पर है। करीब डेढ़ दशक से शिक्षक राजनीति में सक्रिय त्रिपाठी अब भारतीय जनता पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के रूप में विधान परिषद चुनाव लड़ेंगे। खास बात यह है कि इसी सीट से वह 2008, 2014 और 2020 में लगातार तीन बार निर्वाचित हो चुके हैं। पिछली जीत उन्होंने गैर-दलीय शिक्षक संगठन के समर्थन से हासिल की थी, जबकि इस बार उनके साथ भाजपा का आधिकारिक संगठन और चुनावी मंच है।
ध्रुव त्रिपाठी की राजनीतिक पहचान मूल रूप से शिक्षक संगठन से बनी। वह उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट से जुड़े रहे हैं। संगठन में सक्रियता के बाद 2008 में उन्हें गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया। पहली जीत के बाद उन्होंने 2014 में भी सीट बरकरार रखी और 2020 में लगातार तीसरी बार विधान परिषद पहुंचे।2020 का चुनाव उनके राजनीतिक सफर का अहम पड़ाव रहा। उस समय भाजपा ने इस सीट पर अपना अधिकृत प्रत्याशी नहीं उतारा था। चुनावी रिपोर्टों में त्रिपाठी को शर्मा गुट का उम्मीदवार बताया गया, जबकि परिणामों में उनका नाम निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर दर्ज हुआ। इसीलिए उनकी पिछली राजनीतिक पहचान को केवल ‘निर्दलीय’ कहने के बजाय शिक्षक संगठन समर्थित गैर-दलीय राजनीति के रूप में देखना अधिक सटीक होगा।
2020 में त्रिपाठी ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी अजय सिंह को 1935 मतों से हराया था। प्रथम वरीयता के मतों में आवश्यक कोटा पूरा नहीं होने के बाद वरीयता मतों की गणना हुई और त्रिपाठी को विजेता घोषित किया गया। इस जीत के साथ वह इस शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार तीन बार निर्वाचित होने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल हुए।
उनकी यह सफलता किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न से ज्यादा शिक्षक संगठन के बीच बने संपर्क और प्रभाव पर आधारित रही। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के रिकॉर्ड में भी उनके नाम के साथ ‘शिक्षक दल (गैर राजनीतिक)’ का उल्लेख रहा है। यही पृष्ठभूमि 2026 के चुनाव को खास बनाती है।
अब भाजपा ने उन्हें गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से अपना अधिकृत उम्मीदवार घोषित किया है। यानी जिस सीट पर वह अब तक शिक्षक संगठन के आधार पर चुनाव लड़ते रहे, उसी सीट पर इस बार पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी के रूप में मैदान में होंगे। उनके सामने एक तरफ वर्षों से बना शिक्षक संपर्क और चुनावी अनुभव है, तो दूसरी तरफ भाजपा का संगठनात्मक ढांचा।
त्रिपाठी को टिकट दिए जाने से शिक्षक राजनीति में कई सवाल भी उठे हैं। पहला, भाजपा ने तीन बार के निर्वाचित शिक्षक नेता को ही उम्मीदवार क्यों बनाया? दूसरा, क्या शिक्षक संगठनों में उनकी लंबे समय से बनी पकड़ को पार्टी अपने चुनावी आधार से जोड़ना चाहती है? इन सवालों का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की राजनीति सामान्य विधानसभा चुनावों से अलग रही है। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत पहचान, शिक्षक संगठनों में सक्रियता और मतदाताओं से लंबे समय के संपर्क की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भाजपा की ओर से टिकट की घोषणा के बाद पार्टी के भीतर दावेदारी को लेकर भी हलचल सामने आई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार डॉ. संजयन त्रिपाठी, जिन्हें टिकट के दावेदारों में बताया गया था, ने ध्रुव त्रिपाठी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की है। इससे मुकाबले में एक नया आयाम जुड़ गया है।गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में सिद्धार्थनगर समेत 17 जिले शामिल हैं। यहां का चुनाव सामान्य प्रत्यक्ष चुनावों से अलग प्रक्रिया के तहत होता है और मतदाता शिक्षक वर्ग से आते हैं। ऐसे में उम्मीदवारों की संगठनात्मक पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत संपर्क चुनावी गणित का अहम हिस्सा बनते हैं।
ध्रुव त्रिपाठी के लिए इस बार का चुनाव इसलिए भी अलग है कि उनकी अब तक की चुनावी पहचान और मौजूदा राजनीतिक भूमिका में स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। तीन चुनाव शिक्षक संगठन के आधार पर लड़ने और जीतने के बाद अब वह भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार हैं। यह बदलाव केवल उनके राजनीतिक मंच का परिवर्तन नहीं, बल्कि शिक्षक राजनीति और दलगत राजनीति के बीच बदलते संबंधों को भी सामने लाता है।
उनका मौजूदा कार्यकाल छह दिसंबर 2026 को समाप्त होना है। चुनाव कार्यक्रम के अनुसार मतदान 23 अक्टूबर और मतगणना 27 अक्टूबर को प्रस्तावित है। अब चुनावी मैदान में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि त्रिपाठी की तीन चुनावों से बनी शिक्षक राजनीति की पकड़ और भाजपा का संगठनात्मक आधार किस तरह साथ आते हैं तथा अन्य उम्मीदवार किस तरह अपना समर्थन जुटाते हैं।
इस तरह ध्रुव त्रिपाठी की कहानी शिक्षक संगठन से शुरू होकर तीन लगातार चुनावी जीत तक पहुंची और अब भाजपा के आधिकारिक प्रत्याशी के रूप में नए राजनीतिक चरण में प्रवेश कर चुकी है। 2026 का चुनाव उनके लिए चौथी पारी का मुकाबला होने के साथ-साथ गैर-दलीय शिक्षक राजनीति से दलगत राजनीति की ओर हुए इस बदलाव का भी महत्वपूर्ण पड़ाव है।