नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने रविवार को कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके कारण बड़ी संख्या में नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं, स्वभाव से ही मनमानी होगी। उन्होंने कहा कि किसी भी तर्क या बहाने से ऐसी प्रक्रिया को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस भुइयां 19वें NALSAR-जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों को ऐसे दो वर्गों में नहीं बांटता, जिनमें एक को मतदान का अधिकार हो और दूसरे को उससे वंचित कर दिया जाए।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माना गया है, लेकिन यह निश्चित रूप से संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 326 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वयस्क मताधिकार का आधार है।उन्होंने कहा कि कानून मताधिकार के इस्तेमाल को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन ऐसी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 की सीमाओं के भीतर होनी चाहिए। प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए भी किसी नागरिक के मतदान के अधिकार को तर्कहीन या अनुचित तरीके से सीमित नहीं किया जा सकता।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर भी जोरजस्टिस भुइयां ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में उचित प्रक्रिया और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए जाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता का नाम हटाने से पहले प्रक्रिया का पालन किए जाने की बात कही।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी मामले का हवाला देते हुए कहा कि मृत मतदाता के मामले को छोड़कर मतदाता सूची में दर्ज व्यक्ति का नाम बिना नोटिस और सुनवाई के नहीं हटाया जा सकता। उन्होंने 2023 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ फैसले का भी उल्लेख किया।
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और पात्र मतदाताओं के नाम हटने को लेकर राजनीतिक तथा कानूनी बहस जारी है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में चुनाव आयोग की मौजूदा SIR प्रक्रिया का सीधे उल्लेख नहीं किया। इसलिए उनकी टिप्पणी को SIR पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला या सीधे तौर पर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर न्यायिक टिप्पणी बताना उचित नहीं होगा।
जस्टिस भुइयां ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता बताते हुए कहा कि मतदान वह माध्यम है जिसके जरिए आम नागरिक शासन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। उनके मुताबिक मताधिकार को नागरिकता से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
उनकी टिप्पणी का केंद्रीय संदेश यह रहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने या मताधिकार को प्रभावित करने वाली किसी भी प्रक्रिया में संवैधानिक अधिकारों और उचित प्रक्रिया की सुरक्षा जरूरी है।
मताधिकार से वंचित करने वाली प्रक्रिया मनमानी: जस्टिस उज्जल भुइयां
सुप्रीम कोर्ट के जज बोले- कोई भी तर्क ऐसी प्रक्रिया को सही नहीं ठहरा सकता; वोट देने का अधिकार संवैधानिक अधिकार, अनुच्छेद 14 और 326 की कसौटी पर होनी चाहिए प्रक्रिया
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