काठमाण्डूl नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी की सक्रिय दलीय राजनीति में वापसी से नेकपा एमाले के भीतर नेतृत्व और सत्ता-संतुलन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
करीब सात वर्ष तक राष्ट्रपति पद पर रहने के बाद भण्डारी को पार्टी में वरिष्ठ नेता की जिम्मेदारी दी गई है। उनकी वरीयता अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के बाद दूसरे स्थान पर है।भण्डारी की वापसी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगस्त 2025 में एमाले ने उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर रहकर पूर्व राष्ट्रपति की गरिमा के अनुरूप अभिभावक की भूमिका निभाने की सलाह दी थी। मई 2026 में उनकी सदस्यता का नवीनीकरण किया गया और सितंबर में उन्हें वरिष्ठ नेता मनोनीत कर दिया गया। पार्टी ने इसके लिए अपने विधान के प्रावधानों का सहारा लिया है। इस निर्णय को आगामी विधान महाधिवेशन में अनुमोदन के लिए पेश किया जाएगा।

ओली के फैसले के पीछे क्या है राजनीतिक गणित?पार्टी में नेतृत्व के पुनर्गठन की मांग के बीच भण्डारी को दूसरी वरीयता दिए जाने को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कुछ नेताओं और विश्लेषकों का मानना है कि उनकी वापसी से एमाले के भीतर शक्ति-संतुलन प्रभावित हो सकता है। हालांकि, ओली ने उन्हें इसी उद्देश्य से आगे बढ़ाया है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

राष्ट्रपति पद की निष्पक्षता पर सवाल  संविधान में पूर्व राष्ट्रपति के सक्रिय राजनीति में लौटने पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है। इसके बावजूद संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर रह चुका व्यक्ति दलीय राजनीति से दूरी बनाए रखे, तो संस्था की निष्पक्षता और गरिमा मजबूत होती है। दूसरी ओर, कानूनी रोक के अभाव में राजनीतिक वापसी को केवल इसी आधार पर असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।

भण्डारी का कहना है कि वह व्यक्तिगत पद की लालसा से नहीं, बल्कि पार्टी और देश के निर्माण के लिए लौटी हैं। अब उनकी भूमिका पर नजर रहेगी कि वह एमाले में संगठनात्मक सुधार और नेतृत्व की बहस को कितना आगे बढ़ाती है