रीवा (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के रीवा जिले में प्रस्तावित परमाणु बिजली संयंत्र को लेकर ग्रामीणों और प्रशासन के बीच विवाद सामने आया है। रोजौहई गांव के पास परियोजना के लिए प्रारंभिक जांच का काम 9 अक्टूबर को उस समय रुक गया, जब ड्रिलिंग उपकरण पहुंचने पर ग्रामीणों ने विरोध किया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना को टाटा पावर कंपनी लिमिटेड आगे बढ़ा रही है।


विरोध का प्रमुख मुद्दा ग्रामसभा की सहमति है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरई कला में 3 सितंबर को हुई विशेष ग्रामसभा की कार्यवाही में परियोजना पर आपत्तियां दर्ज की गईं। सरपंच कोमल सिंह ने 5 सितंबर को कलेक्टर को पत्र लिखकर विरोध और सहमति या अनुमति नहीं दिए जाने की बात कही।


प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने स्वास्थ्य, पर्यावरण, जलस्रोतों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ग्रामसभा की सहमति के बिना परियोजना आगे बढ़ाई जा रही है और अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) कथित रूप से सरपंच के एक फर्जी पत्र के आधार पर तैयार किया गया। ये आरोप रिपोर्ट में द्विवेदी के हवाले से हैं; उनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सामग्री में नहीं है।


दूसरी ओर, रीवा के कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने कहा कि टाटा पावर को अभी जमीन आवंटित नहीं की गई है। उनके अनुसार, मौजूदा अनुमति केवल स्थल की उपयुक्तता और परियोजना की व्यवहार्यता जांचने तक सीमित है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन को पहले ग्रामसभा की सहमति मिली थी और उसी आधार पर NOC की प्रक्रिया आगे बढ़ी।


इस तरह, परियोजना की प्रारंभिक जांच को लेकर ग्रामीणों की आपत्तियों और प्रशासन के सहमति संबंधी दावे के बीच विवाद बना हुआ है। टाटा पावर की प्रतिक्रिया रिपोर्ट प्रकाशित होने तक उपलब्ध नहीं थी।


कंपनी ने 13 जुलाई 2026 को लिखे एक पत्र में रोजौहई के पास 2×220 मेगावाट क्षमता वाली प्रस्तावित परमाणु परियोजना के लिए शुरुआती गतिविधियां शुरू करने की जानकारी दी थी। रीवा कलेक्टर कार्यालय के 21 अगस्त के पत्र में आठ बोरहोल के जरिए भूवैज्ञानिक जांच का उल्लेख है। इनमें चार बोरहोल 100 मीटर और चार 50 मीटर गहराई तक प्रस्तावित हैं।