कहावत पुरानी है— देखत में छोटन लगें, घाव करें गंभीर। पहले यह बात छोटे पत्थरों, नन्हे कांटों और मामूली दिखने वाली चोटों के लिए कही जाती थी। अब दुनिया की राजनीति में इसे नई पीढ़ी पर भी लागू किया जा सकता है।
दुनिया की राजनीति में जेन-जी ने इस कहावत को नया अर्थ दे दिया है। उम्र छोटी, हाथ में मोबाइल और जुबान पर बड़े सवाल! मगर जब यही युवा सत्ता से हिसाब मांगने सड़क पर उतरते हैं, तो हुक्मरानों के सिंहासन डोलने लगते हैं। उनकी नाराजगी किसी एक नेता से नहीं, उस सत्ता की कार्यशैली से है, जो जनता से वोट तो मांगती है, लेकिन सवालों का जवाब देने से कतराती है।
बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन अगस्त 2024 में शेख हसीना की सत्ता के अंत तक पहुंच गया। श्रीलंका में आर्थिक बदहाली, महंगाई और ईंधन संकट से उपजे जनाक्रोश ने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को पद छोड़ने पर मजबूर किया। नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं का आंदोलन राजनीतिक संकट में बदला और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा।
इन घटनाओं ने सत्ता के गलियारों को बता दिया कि कुर्सी कितनी भी ऊंची हो, जनता के धैर्य से ऊंची नहीं होती। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और बदहाल सार्वजनिक सेवाओं पर उठे सवाल जब जनाक्रोश बनते हैं, तो सरकारी प्रचार की चमक फीकी पड़ने लगती है।
हर जगह कहानी सत्ता परिवर्तन तक नहीं पहुंची। केन्या में प्रस्तावित वित्त विधेयक के खिलाफ युवा सड़कों पर उतरे तो राष्ट्रपति विलियम रुटो को विधेयक वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी। इंडोनेशिया में सांसदों के भत्तों और विशेषाधिकारों पर सवाल उठे।
मोरक्को में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मुद्दों पर युवा मुखर हुए। कहीं सरकार बदली, कहीं फैसला बदला और कहीं सत्ता को जनता के सवालों का सामना करना पड़ा।
जेन-जी का असली प्रहार सत्ता के अहंकार पर है। सोशल मीडिया ने युवाओं को अपनी बात फैलाने, समान समस्याओं से जूझ रहे लोगों को जोड़ने और विरोध को संगठित करने का नया माध्यम दिया है। अब किसी असंतोष को चंद लोगों की नाराजगी बताकर खारिज करना आसान नहीं। सत्ता जिस मुद्दे को दबाना चाहती है, वही कुछ ही समय में सार्वजनिक बहस का केंद्र बन सकता है।
लेकिन सरकार गिरना और व्यवस्था बदलना दो अलग बातें हैं। नेता का इस्तीफा बेरोजगारी खत्म होने, भ्रष्टाचार मिटने या महंगाई घटने की गारंटी नहीं। नई सत्ता भी पुराने ढर्रे पर चलने लगे, तो आंदोलन की उपलब्धि अधूरी रह जाती है। असली बदलाव तब होगा, जब विरोध की मांगें नीतियों में उतरें और जवाबदेही व्यवस्था का हिस्सा बने।
भारत में भी युवा पेपर लीक, भर्ती में देरी और रोजगार के सवालों पर आवाज उठाते रहे हैं। उनकी मांगों का जवाब आश्वासनों से नहीं, निष्पक्ष परीक्षाओं, समयबद्ध नियुक्तियों और पारदर्शी व्यवस्था से दिया जा सकता है। लोकतंत्र में सवाल पूछना सत्ता के खिलाफ अपराध नहीं, नागरिक का अधिकार है।
हुक्मरानों को समझना होगा कि मोबाइल पकड़े हाथ भले छोटे हों, लेकिन उनके सवाल सत्ता की बुनियाद तक पहुंच सकते हैं। जेन-जी का संदेश साफ है—कुर्सी जनता पर हुक्म चलाने का अधिकार नहीं, उसके प्रति जवाबदेही की जिम्मेदारी है। जो सत्ता यह भूलती है, उसे छोटे दिखने वाले विरोध की गंभीर चोट झेलनी पड़ सकती है।
आखिर कहावत यूं ही नहीं बनी—देखत में छोटन लगें, घाव करें गंभीर!
देखते में छोटन लगें, घाव करें गंभीर!
जेन-जी की चोट से कहीं सिंहासन डोला, कहीं सत्ता को फैसले बदलने पड़े
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