काठमान्डू । पश्चिमी नेपाल की थारू बस्तियों में दशैं का पर्व मादल की थाप और सखिया नृत्य के साथ मनाया जा रहा है। दांग, बांके, बर्दिया, कैलाली और कंचनपुर के गांवों में कुलदेवता की पूजा, पितरों को प्रसाद अर्पित करने और मान्यजनों से सफेद अक्षत का टीका लगाकर आशीर्वाद लेने की परंपरा निभाई जा रही है।
शाम होते ही गांवों के चौक, आंगन और चौपाल कृष्णलीला पर आधारित गीतों से गूंज उठते हैं।थारू समुदाय में दशहरे को ‘दश्या’ कहा जाता है। माघी और अटवारी के बाद इसे प्रमुख पर्व माना जाता है। घटस्थापना के दिन मक्का का जमरा रखकर दशैं की शुरुआत होती है। समुदाय के लोगों के अनुसार, मक्का पारंपरिक रूप से उनकी प्रमुख फसल रही है, इसलिए जमरा रखने की परंपरा का संबंध कृषि संस्कृति से भी जुड़ा है।
कैलाली के थारू अगुआ दिलबहादुर चौधरी के मुताबिक, महाष्टमी की शाम घरों में कुलदेवता और पितरों की पूजा कर शराब, ढिकरी सहित पारंपरिक प्रसाद चढ़ाया जाता है। कुछ स्थानों पर कुम्हड़े की बलि देने की भी परंपरा है। नवमी को चावल, मछली और पांच प्रकार की सब्जियां पत्तों के पात्र में रखकर पितरों को अर्पित की जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में नदी किनारे पूजा-अर्चना भी होती है।
दशमी पर गांव के भलमंसहा के घर से सामूहिक टीका लगाने की शुरुआत होती है। थारू समुदाय में सफेद अक्षत का टीका शांति का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, बदलते समय के साथ कुछ स्थानों पर लाल टीका लगाने का चलन भी बढ़ा है।
कृष्णलीला के गीतों पर सखिया नृत्यदशैं का प्रमुख आकर्षण सखिया नृत्य है। थारू भाषा में ‘सखी’ का अर्थ साथी होता है। इस नृत्य में महिलाएं सफेद फरिया और लाल चोलिया पहनती हैं, जबकि पुरुष धोती-कमीज में मादल बजाते हैं। नृत्य शुरू करने से पहले गुरुवा पारंपरिक वाद्ययंत्रों की पूजा करते हैं। गीतों में भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन होता है।
दिनभर काम करने के बाद ग्रामीण शाम को एकत्र होकर घर-घर नृत्य करते हैं। घर के मुखिया अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देते हैं। इससे आपसी मेलजोल और भाईचारा मजबूत होता है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से पारंपरिक रीति-रिवाज बदल रहे हैं। ऐसे में सखिया नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि थारू समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, पूर्वजों की विरासत और सामूहिक जीवन को सहेजने का माध्यम भी है।
मादल की थाप पर थारू बस्तियों में दशैं का उल्लास, सखिया नृत्य बना पहचान
सफेद अक्षत का टीका, कुलदेवता की पूजा और कृष्णलीला के गीतों से जीवंत हुई सदियों पुरानी परंपरा
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
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